अध्याय 1: पृष्ठभूमि और मसालों की प्यास
“किस तरह यूरोप को भारत के मसालों की तलब लगी और समुद्र के रास्ते की खोज शुरू हुई।”
कहानी की शुरुआत भारत में नहीं, बल्कि यूरोप में होती है।
समय था 15वीं शताब्दी का। यूरोप में सर्दियों के मौसम में मांस को सुरक्षित रखने और उसे स्वादिष्ट बनाने के लिए मसालों की, विशेषकर काली मिर्च (जिसे वे ‘काला सोना’ कहते थे) की अत्यधिक आवश्यकता होती थी। यह मसाले मुख्य रूप से भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया से आते थे। लेकिन यह व्यापार इतना आसान नहीं था। सदियों से, भारत से यूरोप तक मसालों का व्यापार मुख्य रूप से अरब व्यापारियों के नियंत्रण में था। वे भारत से मसाले खरीदते, लाल सागर या फारस की खाड़ी के रास्ते ले जाते, और फिर इटली (वेनिस और जेनेवा) के व्यापारियों को भारी मुनाफे पर बेचते थे। इतालवी व्यापारी पूरे यूरोप में इसका वितरण करते थे।
1453 का टर्निंग पॉइंट: कुस्तुनतुनिया का पतन
इतिहास में एक बहुत बड़ी घटना घटी जिसने दुनिया का नक्शा और व्यापार का तरीका हमेशा के लिए बदल दिया। वर्ष 1453 में, उस्मानी तुर्कों (Ottoman Turks) ने कुस्तुनतुनिया (Constantinople – आधुनिक इस्तांबुल) पर कब्ज़ा कर लिया। कुस्तुनतुनिया पूर्व (एशिया) और पश्चिम (यूरोप) के बीच का मुख्य ज़मीनी दरवाज़ा था। तुर्कों ने इस मार्ग पर भारी कर (tax) लगा दिया और यूरोपीय व्यापारियों के लिए यह रास्ता लगभग बंद कर दिया।
अब यूरोप के देशों, विशेषकर पुर्तगाल और स्पेन के सामने एक बड़ा संकट था। उन्हें भारत के मसाले चाहिए थे, लेकिन अरबों और तुर्कों का एकाधिकार तोड़ना ज़रूरी था। इसके लिए केवल एक ही रास्ता बचा था – समुद्र का रास्ता खोज निकालना।
इस खोज में सबसे आगे था पुर्तगाल। पुर्तगाल के राजकुमार, जिन्हें इतिहास में ‘प्रिंस हेनरी द नेविगेटर’ (Prince Henry the Navigator) के नाम से जाना जाता है, ने समुद्री यात्राओं को बहुत बढ़ावा दिया। उन्होंने नाविकों, भूगोलवेत्ताओं और जहाज बनाने वालों को इकट्ठा किया। कंपास (दिक्सूचक) और नए प्रकार के जहाज़ों (कैरावेल) के आविष्कार ने इस सपने को पंख दे दिए।
पुर्तगालियों ने धीरे-धीरे अफ्रीका के पश्चिमी तट के साथ-साथ दक्षिण की ओर बढ़ना शुरू किया। 1487 ईसवी में, एक पुर्तगाली नाविक बार्थोलोम्यू डियाज़ (Bartholomew Diaz) अफ्रीका के सबसे दक्षिणी सिरे तक पहुँचने में सफल रहा। उसने इस जगह को ‘तूफानी अंतरीप’ कहा, लेकिन पुर्तगाल के राजा ने इसका नाम ‘केप ऑफ गुड होप’ (Cape of Good Hope – उत्तमाशा अंतरीप) रखा, क्योंकि यहाँ से भारत पहुँचने की एक अच्छी उम्मीद जगी थी। हालांकि, डियाज़ भारत नहीं पहुँच सका और वापस लौट गया। लेकिन उसने आने वाले नाविकों के लिए रास्ता खोल दिया था।
अध्याय 2: वास्को डी गामा की ऐतिहासिक यात्रा
“एक ऐसी यात्रा जिसने पूरब और पश्चिम को हमेशा के लिए जोड़ दिया।”
बार्थोलोम्यू डियाज़ की यात्रा के लगभग दस साल बाद, 1497 में पुर्तगाल के राजा मैनुअल प्रथम ने एक साहसी नाविक वास्को डी गामा (Vasco da Gama) को भारत खोजने का जिम्मा सौंपा। चार जहाजों (साओ गेब्रियल, साओ राफेल, बेरियो और एक सप्लाई जहाज) का बेड़ा लेकर वास्को डी गामा लिस्बन से निकला।
यह यात्रा बहुत कठिन थी। महीनों तक वे समुद्र में भटकते रहे, भयंकर तूफानों का सामना किया और उनके कई नाविक स्कर्वी (विटामिन सी की कमी) रोग से मारे गए। केप ऑफ गुड होप का चक्कर लगाते हुए, वे अफ्रीका के पूर्वी तट पर मोजाम्बिक और फिर मालिंदी (Malindi) पहुँचे।
अब्दुल मजीद की मदद
मालिंदी में वास्को डी गामा की किस्मत चमक गई। वहाँ उसकी मुलाकात एक अनुभवी गुजराती पथ प्रदर्शक (Navigator) से हुई, जिसका नाम अब्दुल मजीद था। अब्दुल मजीद को हिंद महासागर की मानसूनी हवाओं और रास्तों का बहुत अच्छा ज्ञान था। उसी के मार्गदर्शन में, पुर्तगाली बेड़े ने हिंद महासागर को पार किया।
17 मई 1498 – इतिहास का वह दिन
अंततः, लगभग 10 महीने की लंबी और कष्टदायी यात्रा के बाद, 17 मई 1498 (कुछ स्रोतों में 20 मई) को वास्को डी गामा का बेड़ा भारत के पश्चिमी तट पर, केरल के कालीकट (Calicut) बंदरगाह के कप्पडक्कडू (Kappad) नामक स्थान पर पहुँचा। यह एक युगांतरकारी क्षण था। यूरोप से भारत तक का सीधा समुद्री मार्ग खोज लिया गया था।
उस समय कालीकट का शासक एक हिंदू राजा था, जिसकी पैतृक उपाधि ज़मोरिन (Zamorin – समुद्री) थी। ज़मोरिन ने वास्को डी गामा का बहुत ही गर्मजोशी और मित्रतापूर्ण तरीके से स्वागत किया। भारतीय परंपरा ‘अतिथि देवो भव:’ के अनुसार पुर्तगालियों का सत्कार किया गया।
अरबों का विरोध: हालांकि राजा ज़मोरिन खुश था, लेकिन कालीकट में पहले से बसे हुए अरब व्यापारी वास्को डी गामा के आने से बहुत घबरा गए। वे समझ गए थे कि ये पुर्तगाली उनके व्यापारिक एकाधिकार को खत्म कर देंगे। अरबों ने वास्को डी गामा के खिलाफ ज़मोरिन के कान भरने की कोशिश की और पुर्तगालियों के लिए मुश्किलें पैदा कीं।
इसके बावजूद, वास्को डी गामा ने भारत में लगभग 3 महीने बिताए। जब वह वापस पुर्तगाल लौटा, तो अपने साथ जहाजों में भरकर भारी मात्रा में मसाले (विशेषकर काली मिर्च) और जड़ी-बूटियाँ ले गया। पुर्तगाल पहुँचकर जब उसने इन सामानों को बेचा, तो यात्रा का सारा खर्च निकालने के बाद भी उसे 60 गुना (60x) अधिक मुनाफा हुआ! इस बेतहाशा मुनाफे की खबर ने पूरे यूरोप में तहलका मचा दिया। अब भारत सिर्फ एक सपना नहीं था, बल्कि एक सोने की चिड़िया बन चुका था जिस तक पहुँचने का रास्ता पुर्तगालियों के पास था।
अध्याय 3: साम्राज्य की नींव और फैक्ट्रियाँ
“व्यापारियों से शासक बनने की ओर पहला कदम।”
वास्को डी गामा की सफलता के बाद, पुर्तगालियों ने तय किया कि वे भारत के व्यापार पर पूरा नियंत्रण करेंगे। वर्ष 1500 में, पेड्रो अल्वारेस कैब्राल (Pedro Álvares Cabral) के नेतृत्व में एक बहुत बड़ा और हथियारों से लैस बेड़ा भारत भेजा गया। रास्ते में कैब्राल ने ब्राज़ील की भी खोज कर ली।
कालीकट पहुँचने पर कैब्राल का अरब व्यापारियों के साथ सीधा और हिंसक टकराव हुआ। अरबों ने पुर्तगाली फैक्ट्री पर हमला कर दिया जिसमें कुछ पुर्तगाली मारे गए। इसके जवाब में कैब्राल ने अरब जहाजों को पकड़ लिया, नाविकों को मार डाला और कालीकट शहर पर समुद्र से भारी बमबारी की। ज़मोरिन के साथ पुर्तगालियों के रिश्ते पूरी तरह बिगड़ गए। इसके बाद कैब्राल कोचीन (Cochin) और कन्नूर (Cannanore) चला गया, जहाँ के शासक ज़मोरिन के दुश्मन थे। उन्होंने पुर्तगालियों का स्वागत किया।
वास्को डी गामा की वापसी: 1502 में वास्को डी गामा दूसरी बार भारी सैन्य बल के साथ भारत आया। इस बार उसका मकसद शांति नहीं, बल्कि अरबों को व्यापार से पूरी तरह बाहर खदेड़ना था। उसने ज़मोरिन से मांग की कि वह अरब व्यापारियों को कालीकट से निकाल दे। ज़मोरिन के मना करने पर वास्को डी गामा ने भयंकर क्रूरता दिखाई। उसने अरब और भारतीय जहाजों को लूटा, नाविकों के हाथ-पैर कटवा दिए और जहाजों में आग लगा दी।
प्रथम पुर्तगाली फैक्ट्री (1503)
भारत में पुर्तगालियों ने अपना पहला व्यापारिक केंद्र (Factory/दुर्ग) कोचीन (Cochin) में 1503 में स्थापित किया। कोचीन उनका प्रारंभिक मुख्यालय बना। (ध्यान दें: उस समय फैक्ट्री का मतलब कारखाना नहीं, बल्कि एक किला-नुमा गोदाम होता था जहाँ व्यापारिक सामान रखा जाता था)।
दूसरी पुर्तगाली फैक्ट्री (1505)
इसके तुरंत बाद, 1505 में उन्होंने अपनी दूसरी फैक्ट्री कन्नूर (Cannanore) में स्थापित कर ली। अब पुर्तगाली मालाबार तट पर मज़बूती से जम चुके थे।
व्यापार अब एक युद्ध बन चुका था। पुर्तगाल के राजा ने महसूस किया कि केवल व्यापारी भेजकर काम नहीं चलेगा, भारत में पुर्तगाली हितों की रक्षा और प्रशासन के लिए एक ‘गवर्नर’ (वायसराय) की नियुक्ति आवश्यक है। यहीं से शुरू होता है पुर्तगाली गवर्नरों का युग, जिन्होंने व्यापारिक कोठियों को एक विशाल समुद्री साम्राज्य (Estado da India) में बदल दिया।
अध्याय 4: पुर्तगाली सत्ता के निर्माता (गवर्नर)
“अलमीडा, अल्बुकर्क और नीनो डी कुन्हा – जिन्होंने समुद्र पर राज किया।”
1. फ्रांसिस्को डी अलमीडा (Francisco de Almeida)
भारत में प्रथम पुर्तगाली गवर्नर/वायसराय
1505 में पुर्तगाल के राजा ने फ्रांसिस्को डी अलमीडा को भारत का पहला गवर्नर बनाकर भेजा। उसे भारत में पुर्तगाली किलों की सुरक्षा और व्यापार को बढ़ाने का काम सौंपा गया था।
‘शांत जल की नीति’ (Blue Water Policy): अलमीडा का मानना था कि पुर्तगालियों को भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा करने या ज़मीनी लड़ाई लड़ने के बजाय अपना पूरा ध्यान समुद्र (हिंद महासागर) पर नियंत्रण करने में लगाना चाहिए। जो समुद्र का राजा होगा, वही व्यापार का राजा होगा। इसी नीति को इतिहास में ‘ब्लू वाटर पॉलिसी’ (Blue Water Policy) कहा जाता है।
समुद्र पर कब्ज़ा करने के कारण उसका टकराव मिस्र, तुर्की और गुजरात के मुस्लिम शासकों के संयुक्त नौसैनिक बेड़े से हुआ। 1508 में चौल (Chaul) के युद्ध में अलमीडा का बेटा मारा गया और पुर्तगाली हार गए। लेकिन अलमीडा ने हार नहीं मानी। 1509 में दीव के युद्ध (Battle of Diu) में उसने तीनों की संयुक्त नौसेना को पूरी तरह नष्ट कर दिया और एशिया के समुद्रों पर पुर्तगाली वर्चस्व स्थापित कर दिया।
2. अल्फांसो डी अल्बुकर्क (Afonso de Albuquerque)
पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक (Real Founder)
अलमीडा के बाद 1509 में अल्बुकर्क गवर्नर बना। उसे ही भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का ‘वास्तविक संस्थापक’ माना जाता है, क्योंकि उसी ने ज़मीनी क्षेत्रों पर कब्ज़ा करने की आक्रामक नीति अपनाई।
- गोवा पर कब्ज़ा (1510): यह उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी। 1510 में अल्बुकर्क ने बीजापुर के सुल्तान ‘यूसुफ आदिल शाह’ पर हमला किया और गोवा को जीत लिया। गोवा एक बहुत ही समृद्ध बंदरगाह था। यह सिकंदर के बाद किसी भी यूरोपीय शक्ति द्वारा भारतीय ज़मीन पर पहला कब्ज़ा था।
- सामरिक नियंत्रण: उसने फारस की खाड़ी में होर्मुज (Hormuz) और दक्षिण-पूर्व एशिया में मलक्का (Malacca – मसालों का मुख्य केंद्र) पर भी कब्ज़ा कर लिया, जिससे पूरे हिंद महासागर के व्यापारिक रास्तों को सील कर दिया गया।
- सामाजिक नीतियाँ: भारत में पुर्तगालियों की स्थायी आबादी बसाने के लिए उसने अपने सैनिकों को भारतीय महिलाओं से विवाह करने के लिए प्रोत्साहित किया।
- सती प्रथा पर रोक: उसने अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों (जैसे गोवा) में हिंदू महिलाओं के साथ होने वाली क्रूर सती प्रथा पर रोक लगाने का प्रयास किया। यह भारतीय इतिहास में सती प्रथा को रोकने के शुरुआती प्रयासों में से एक था।
3. नीनो डी कुन्हा (Nino da Cunha)
अल्बुकर्क के बाद के गवर्नरों में नीनो डी कुन्हा सबसे प्रमुख था। उसने पुर्तगाली साम्राज्य के विस्तार को और आगे बढ़ाया।
- राजधानी परिवर्तन (1530): उसने भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का मुख्यालय (राजधानी) कोचीन से हटाकर गोवा स्थानांतरित कर दिया। इसके बाद 1961 तक गोवा ही पुर्तगालियों की राजधानी रहा।
- गुजरात के बहादुर शाह से संघर्ष: कुन्हा ने उत्तर की ओर अपना प्रभाव बढ़ाया। उसका गुजरात के शासक बहादुर शाह के साथ संघर्ष हुआ। बहादुर शाह उस समय हुमायूँ (मुगल सम्राट) के आक्रमण से परेशान था, इसलिए उसने पुर्तगालियों से मदद मांगी और बदले में बेसिन (Bassein – 1534) और दीव (Diu – 1535) पुर्तगालियों को दे दिए।
- बाद में जब बहादुर शाह पुर्तगालियों के बढ़ते प्रभाव से घबराया, तो दोनों के बीच एक समझौते के दौरान पुर्तगाली जहाज़ पर झगड़ा हो गया और बहादुर शाह समुद्र में डूबकर मर गया (या उसे पुर्तगालियों ने मार दिया)।
नीनो डी कुन्हा के समय तक पुर्तगालियों ने बंगाल में भी हुगली (Hooghly) और मद्रास के पास सेंट थोम (San Thome) में अपनी बस्तियां बसा ली थीं। पुर्तगाली अब पूरे भारत के तटीय क्षेत्रों के बेताज बादशाह बन चुके थे।
अध्याय 5: कार्टेज व्यवस्था और साम्राज्य का पतन
“समुद्र के लुटेरे और एक विशाल साम्राज्य का सिकुड़ना।”
कार्टेज-आर्मेडा-काफिला व्यवस्था (Cartaze System)
पुर्तगालियों ने खुद को “सागर का स्वामी” (Lord of the Sea) घोषित कर दिया था। उन्होंने हिंद महासागर में व्यापार पर एकाधिकार बनाए रखने के लिए एक बहुत ही क्रूर और सख्त व्यवस्था लागू की, जिसे कार्टेज (Cartaze) व्यवस्था कहा जाता है।
यह मूल रूप से एक परमिट या लाइसेंस (Pass) था। कोई भी भारतीय या अरबी जहाज़ पुर्तगालियों से ‘कार्टेज’ (पास) खरीदे बिना अरब सागर में प्रवेश नहीं कर सकता था। यदि कोई जहाज़ बिना कार्टेज के पकड़ा जाता, तो पुर्तगाली उस जहाज़ को लूट लेते थे या डुबो देते थे। यहाँ तक कि महान मुगल सम्राट अकबर (Akbar) को भी अपने जहाज़ों को मक्का भेजने (हज यात्रा) के लिए पुर्तगालियों से कार्टेज लेना पड़ा था! यह दर्शाता है कि समुद्र में मुगलों के पास कोई नौसैनिक ताकत नहीं थी और पुर्तगाली कितने शक्तिशाली थे।
काफिला व्यवस्था के तहत, स्थानीय जहाजों को पुर्तगाली नौसैनिक बेड़े (आर्मेडा) की सुरक्षा में चलना पड़ता था, जिसके लिए उनसे शुल्क वसूला जाता था। इसके अलावा, किसी भी भारतीय जहाज को काली मिर्च और गोला-बारूद ले जाने की अनुमति नहीं थी।
पुर्तगाली साम्राज्य का पतन
16वीं सदी में जो पुर्तगाली साम्राज्य अजेय लग रहा था, 17वीं सदी आते-आते वह ताश के पत्तों की तरह ढहने लगा। इसके कई कारण थे:
- धार्मिक असहिष्णुता: पुर्तगाली धार्मिक रूप से अत्यधिक कट्टर थे। उन्होंने भारत में ईसाई धर्म का जबरन प्रचार किया, मंदिरों और मस्जिदों को तोड़ा और गैर-ईसाइयों पर अत्याचार (Goa Inquisition) किए। इससे स्थानीय जनता उनके खिलाफ हो गई।
- डचों और अंग्रेजों का आगमन: 17वीं शताब्दी की शुरुआत में हॉलैंड (डच) और ब्रिटेन (अंग्रेज़) की शक्तिशाली ईस्ट इंडिया कंपनियाँ भारत आ गईं। उनकी नौसेना पुर्तगालियों से कहीं अधिक आधुनिक और मज़बूत थी। अंग्रेज़ों ने 1612 में स्वाली (Swally) के युद्ध में पुर्तगालियों को हरा दिया। डचों ने धीरे-धीरे मलक्का और श्रीलंका के उनके ठिकानों पर कब्ज़ा कर लिया।
- ब्राज़ील की खोज: पुर्तगालियों ने दक्षिण अमेरिका में ब्राज़ील की खोज कर ली थी। ब्राज़ील में उन्हें अपार प्राकृतिक संपदा दिखी, इसलिए उन्होंने अपना ध्यान भारत से हटाकर ब्राज़ील पर केंद्रित कर दिया।
- मुगलों का क्रोध (हुगली घटना): पुर्तगाली बंगाल के हुगली में समुद्री डकैती (Piracy) और दास व्यापार करने लगे थे। वे मुगल साम्राज्य की जनता को गुलाम बना रहे थे। इससे क्रोधित होकर 1632 में मुगल बादशाह शाहजहाँ (Shah Jahan) के सूबेदार कासिम खान ने हुगली पर हमला किया और पुर्तगालियों को वहां से खदेड़ दिया, हज़ारों पुर्तगालियों को बंदी बना लिया गया।
- मराठों का प्रहार: 1739 में मराठा साम्राज्य के पेशवा बाजीराव प्रथम के भाई चिमाजी अप्पा (Chimaji Appa) ने पुर्तगालियों पर भयानक आक्रमण किया। मराठों ने पुर्तगालियों से उनके सबसे महत्वपूर्ण ठिकाने – सालसेट (Salsette) और बेसिन (Bassein) छीन लिए।
अंततः, पुर्तगाली साम्राज्य जो कभी पूरे हिंद महासागर पर राज करता था, केवल गोवा, दमन और दीव तक सिमट कर रह गया। हालांकि, वे भारत आने वाले पहले यूरोपीय थे (1498), और वे सबसे अंत में भारत छोड़कर गए (1961 – आज़ादी के 14 साल बाद, ‘ऑपरेशन विजय’ के तहत भारतीय सेना ने गोवा को आज़ाद कराया)।
पुर्तगाली शक्ति का उत्थान और पतन (1498 – 1961)
यह ग्राफ भारतीय उपमहाद्वीप में पुर्तगाली राजनैतिक और समुद्री प्रभाव का एक अनुमानित सूचकांक (0-100) दर्शाता है।
* यह ग्राफ ऐतिहासिक घटनाओं के प्रभाव को समझाने के लिए एक वैचारिक प्रतिनिधित्व है।
अध्याय 6: भारत को पुर्तगालियों की देन
“भले ही उनका साम्राज्य खत्म हो गया, लेकिन वे भारतीय संस्कृति और खेती में अपनी गहरी छाप छोड़ गए।”
पुर्तगाली भारत में व्यापार और राज करने आए थे, लेकिन वे अपने साथ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों (खासकर दक्षिण अमेरिका/ब्राज़ील) से ऐसी चीजें लाए जो आज भारतीय जीवन और खान-पान का अभिन्न अंग बन चुकी हैं। इसके अलावा तकनीक और वास्तुकला में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण है।
नई फसलें
आज की भारतीय रसोई इनके बिना अधूरी है! पुर्तगाली अपने साथ मध्य और दक्षिण अमेरिका से कई फसलें भारत लाए। इनमें आलू, टमाटर, हरी मिर्च, पपीता, अनानास, मक्का, मूंगफली और काजू शामिल हैं। आज भारत इन फसलों के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है।
तंबाकू की खेती
भारत में तंबाकू (Tobacco) लाने का श्रेय भी पुर्तगालियों को जाता है। उन्होंने ही सबसे पहले इसकी खेती शुरू की। मुगल सम्राट अकबर के दरबार में तंबाकू पहली बार पेश किया गया था और बाद में जहाँगीर ने तंबाकू पीने की बुरी आदत को देखते हुए इस पर प्रतिबंध लगाने का आदेश भी निकाला था।
प्रथम प्रिंटिंग प्रेस
ज्ञान के प्रसार में पुर्तगालियों का एक बहुत बड़ा योगदान रहा है। 1556 ईसवी में गोवा में पुर्तगाली पादरियों द्वारा भारत की पहली प्रिंटिंग प्रेस (Printing Press – छापाखाना) स्थापित की गई। 1557 में इस प्रेस से पहली किताब छापी गई, जिसने भारत में शिक्षा और सूचना के नए युग की शुरुआत की।
गोथिक वास्तुकला (Gothic Architecture)
पुर्तगालियों ने भारत में भवन निर्माण की एक नई शैली की शुरुआत की, जिसे ‘गोथिक वास्तुकला’ (Gothic Architecture) कहा जाता है। इसमें ऊँचे, नुकीले मेहराब, बड़ी खिड़कियाँ और भव्य चर्च शामिल थे। गोवा के प्रसिद्ध चर्च (जैसे बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस, जहाँ सेंट फ्रांसिस ज़ेवियर के अवशेष रखे हैं) इसी वास्तुकला के शानदार उदाहरण हैं। उन्होंने जहाज निर्माण तकनीक को भी भारत में आधुनिक रूप दिया।
कहानी का अंत
वास्को डी गामा के आने (1498) से लेकर 1961 में गोवा की आज़ादी तक, पुर्तगालियों ने भारतीय इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी। एक छोटी सी व्यापारिक कोठी से शुरू होकर, समुद्र के बेताज बादशाह बनने और फिर सिमट कर रह जाने की यह गाथा इतिहास के पन्नों में हमेशा दर्ज रहेगी।
