भारत में फ्रांसीसी: उदय और अस्त
1664 की स्थापना से लेकर वांडीवाश के युद्ध तक का पूरा सफर। एक सरल, विस्तृत कहानी और आगामी परीक्षाओं के लिए 25 महत्वपूर्ण प्रश्न।
कम्पनी की ऐतिहासिक यात्रा
इस खंड में हम जानेंगे कि कैसे फ्रांस से उठी एक व्यापारिक महत्वाकांक्षा ने भारत की धरती पर कदम रखा। यह कहानी बहुत ही आसान भाषा में बताई गई है जिसमें दिए गए सभी बिंदुओं (1664 से 1763 तक) का विस्तार से वर्णन है।
अध्याय 1: शुरुआत – एक सम्राट का सपना (1664)
एक समय की बात है, 17वीं शताब्दी का दौर चल रहा था। यूरोप के कई देश, जैसे पुर्तगाल, डच (हॉलैंड) और अंग्रेज, भारत और पूर्व के देशों के साथ मसालों और कपड़ों का व्यापार करके बहुत अमीर हो रहे थे। इन सबको देखकर फ्रांस भी पीछे नहीं रहना चाहता था। उस समय फ्रांस में एक बहुत ही ताकतवर राजा का शासन था, जिनका नाम था लुई 14वां (Louis XIV)।
राजा लुई 14वें के दरबार में एक बहुत ही चतुर और दूरदर्शी मंत्री थे, जिनका नाम कोलबर्ट (Colbert) था। कोलबर्ट ने राजा को समझाया कि अगर फ्रांस को दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बनना है, तो हमें भी भारत के साथ सीधा व्यापार करना होगा। अपने मंत्री कोलबर्ट के प्रयासों और सलाह पर, राजा लुई 14वें ने वर्ष 1664 में एक व्यापारिक कंपनी बनाने का आदेश दिया।
इस कंपनी का नाम रखा गया “Compagnie des Indes Orientales” (फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी)। ध्यान देने वाली बात यह है कि जहाँ अंग्रेजों की कंपनी प्राइवेट व्यापारियों की थी, वहीं फ्रांसीसी कंपनी पूरी तरह से एक सरकारी कंपनी (State-controlled) थी। इसका सारा खर्चा और नियंत्रण फ्रांस की सरकार के हाथों में था।
अध्याय 2: भारत की धरती पर पहला कदम (1667 – 1669)
कंपनी बनने के बाद, भारत पहुंचने की तैयारियां शुरू हुईं। वर्ष 1667 में फ्रांस से एक बड़ा अभियान भारत की ओर रवाना हुआ। इस दल का नेतृत्व फ्रेंकोइस कैरो (Francois Caron) कर रहे थे। समुद्री रास्तों की मुश्किलों का सामना करते हुए अंततः यह दल भारत के तटों पर पहुंचा।
भारत पहुंचने के बाद, फ्रेंकोइस कैरो ने व्यापार के लिए एक उपयुक्त जगह की तलाश की। उनकी नजर गुजरात के समृद्ध बंदरगाह शहर सूरत पर पड़ी। और इस तरह, 1668 में सूरत में फ्रांसीसियों ने अपनी पहली फैक्ट्री (व्यापारिक केंद्र) स्थापित की। यह भारत में उनके लंबे सफर की पहली पक्की ईंट थी।
फ्रांसीसी सिर्फ पश्चिम तट तक सीमित नहीं रहना चाहते थे। अगले ही साल, 1669 में, एक और फ्रांसीसी अधिकारी मरकारा (Marcara) ने भारत के पूर्वी तट (गोलकुंडा राज्य के तहत) का रुख किया। वहां उन्होंने सुल्तान से फरमान प्राप्त किया और मसूलीपट्टनम (मछलीपट्टनम) में फ्रांसीसियों की दूसरी फैक्ट्री स्थापित की। अब फ्रांसीसियों का व्यापार भारत के दोनों तटों से शुरू हो चुका था।
अध्याय 3: विस्तार और स्वर्ण युग – पांडिचेरी की नींव (1673 – 1690)
समय आगे बढ़ा और भारत में फ्रांसीसियों को सबसे बड़ी सफलता तब मिली जब 1673 में दो फ्रांसीसी अधिकारियों – फ्रैंको मार्टिन (Francois Martin) और बेलैंग डी लेस्पिने (Bellanger de Lespinay) – ने वलिकोंडपुरम के सूबेदार शेर खां लोदी से मुलाकात की। उन्होंने शेर खां लोदी से एक छोटा सा गांव प्राप्त किया। इस छोटे से गांव का नाम था ‘पुदुच्चेरी’ (जिसे हम आज पांडिचेरी कहते हैं)।
पांडिचेरी का विकास बहुत तेजी से हुआ। वर्ष 1674 में, फ्रैंको मार्टिन पांडिचेरी के पहले गवर्नर बने। फ्रैंको मार्टिन एक बहुत ही योग्य प्रशासक थे। उन्होंने पांडिचेरी को एक शानदार शहर में बदल दिया और इसकी सुरक्षा के लिए वहां फोर्ट लुई (Fort Louis) नामक एक मजबूत किले का निर्माण करवाया। पांडिचेरी जल्द ही भारत में फ्रांसीसी शक्ति का मुख्य केंद्र (मुख्यालय) बन गया।
दक्षिण में अपनी स्थिति मजबूत करने के बाद, फ्रांसीसियों की नजर समृद्ध प्रांत बंगाल पर पड़ी। 1690 में, उन्होंने तत्कालीन बंगाल के मुगल सूबेदार/नवाब शाइस्ता खां (Shaista Khan) से अनुमति प्राप्त की और चंद्रनगर (Chandannagar) की बस्ती बसायी। चंद्रनगर बंगाल में उनका सबसे बड़ा व्यापारिक अड्डा बन गया।
अध्याय 4: एंग्लो-फ्रेंच संघर्ष – कर्नाटक के युद्ध (1746 – 1763)
18वीं सदी के मध्य तक आते-आते, भारत में व्यापारिक एकाधिकार के लिए अंग्रेज (British) और फ्रांसीसी (French) आमने-सामने आ गए। दोनों ही भारत पर अपना नियंत्रण चाहते थे। इस दुश्मनी का नतीजा था – कर्नाटक युद्ध (Carnatic Wars)। ये युद्ध मुख्य रूप से दक्षिण भारत (कर्नाटक क्षेत्र) में लड़े गए।
प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746-48)
कारण: यह युद्ध असल में यूरोप में चल रहे ‘ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार युद्ध’ का विस्तार था। यूरोप में अंग्रेज और फ्रांसीसी लड़ रहे थे, तो भारत में भी लड़ने लगे। (यह डुप्ले का समय था)।
प्रमुख घटना: इस युद्ध की सबसे बड़ी घटना थी सेंट थोमे (St. Thome) का युद्ध या अडयार का युद्ध (1746)। इस युद्ध में फ्रांसीसी सेना ने कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन की एक विशाल सेना को हरा दिया था, जिससे साबित हुआ कि यूरोपीय अनुशासित सेना कितनी ताकतवर है।
संधि: यूरोप में युद्ध समाप्त हुआ तो भारत में भी 1748 में ‘एक्स-ला-चैपल की संधि’ (Treaty of Aix-la-Chapelle) हुई, जिससे प्रथम कर्नाटक युद्ध समाप्त हो गया।
द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1749-54)
कारण: इसका कारण भारत के आंतरिक मामले थे। हैदराबाद (नासिर जंग बनाम मुजफ्फर जंग) और कर्नाटक (अनवरुद्दीन बनाम चंदा साहेब) में गद्दी (उत्तराधिकार) के लिए लड़ाई छिड़ गई। अंग्रेजों ने एक पक्ष का साथ दिया और फ्रांसीसी गवर्नर डुप्ले ने दूसरे पक्ष का।
प्रमुख घटना: अम्बर का युद्ध (1749) इसमें प्रमुख था जिसमें अनवरुद्दीन मारा गया। शुरुआत में फ्रांसीसी हावी रहे, लेकिन बाद में अंग्रेजों (रॉबर्ट क्लाइव) ने बाजी पलट दी। फ्रांसीसी सरकार ने भारी खर्च से डरकर अपने सबसे काबिल गवर्नर डुप्ले को वापस फ्रांस बुला लिया और गोडेहू (Godeheu) को नया गवर्नर बनाकर भेजा।
संधि: गोडेहू ने अंग्रेजों के साथ 1755 में ‘पांडिचेरी की संधि’ कर ली और यह युद्ध भी रुक गया।
तृतीय कर्नाटक युद्ध (1756-63) और फ्रांसीसियों का पतन
कारण: यूरोप में ‘सप्तवर्षीय युद्ध’ (Seven Years’ War) शुरू हो गया और भारत में भी दोनों फिर से भिड़ गए।
प्रमुख घटना: 1760 में वांडीवाश (Wandiwash) का निर्णायक युद्ध लड़ा गया। अंग्रेजी सेना का नेतृत्व सर आयर कूट (Sir Eyre Coote) ने किया और फ्रांसीसी सेना का नेतृत्व काउंट डी लाली (Comte de Lally) कर रहे थे। इस भयंकर युद्ध में फ्रांसीसी बुरी तरह हार गए।
संधि: 1763 में ‘पेरिस की संधि’ (Treaty of Paris) हुई। इस संधि ने भारत में फ्रांसीसियों के साम्राज्य के सपने को हमेशा के लिए चकनाचूर कर दिया। उन्हें उनके कारखाने वापस तो मिल गए, लेकिन अब वे वहां किलेबंदी नहीं कर सकते थे और न ही सेना रख सकते थे। वे भारत में केवल व्यापारी बनकर रह गए।
ऐतिहासिक घटनाक्रम (विज़ुअलाइज़ेशन)
नीचे दिए गए चार्ट में फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की प्रमुख घटनाओं को वर्ष के अनुसार दर्शाया गया है। बिंदुओं पर कर्सर ले जाकर विवरण देखें।
प्रतियोगी परीक्षा क्विज़ (25 MCQs)
इस कहानी और दिए गए नोट्स पर आधारित 25 महत्वपूर्ण प्रश्न। ये सभी प्रश्न किसी न किसी UPSC, State PCS, SSC, या Railway की परीक्षा में पूछे गए हैं। अपने ज्ञान का परीक्षण करें!
