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13. विश्वशांतिः (विश्व की शांति)
पाठ परिचय (Viswa Shanti)
आज विश्वभर में विभिन्न प्रकार के विवाद छिड़े हुए हैं जिनसे देशों में आन्तरिक और बाह्य अशान्ति फैली हुई है। स्वार्थप्रेरित होकर अशांति का वातावरण बना हुआ है। इस पाठ में इस समस्या का निवारणोपाय प्रस्तुत है।
(पाठेऽस्मिन् संसारे वर्तमानस्य अशान्तिवातावरणस्य चित्रणं तत्समाधानोपायश्च निरूपितौ । देशेषु आन्तरिकी वाह्या च अशान्तिः वर्तते । तामुपेक्ष्य न कश्चित् स्वजीवनं नेतुं समर्थः । सेयम् अशान्तिः सार्वभौमिकी वर्तते इति दुःखस्य विषयः। सर्वे जनाः तया अशान्त्या चिन्तिताः सन्ति । संसारे तन्निवारणाय प्रयासाः क्रियन्ते ।)
अर्थ: इस पाठ में वर्तमान संसार में अशांति का चित्रण और इसके समाधान को निरूपित किया गया है। देशों में आंतरिक और बाह्य अशांति है। पूरे विश्व में अशांति फैला हुआ है। सभी लोग चिन्तित है।
वर्तमान अशांति का वातावरण
वर्तमाने संसारे प्रायशः सर्वेषु देशेषु उपद्रवः अशान्तिर्वा दृश्यते । क्वचिदेव शान्तं वातावरणं वर्तते । क्वचित् देशस्य आन्तरिकी समस्यामाश्रित्य कलहो वर्तते, तेन शत्रुराज्यानि मोदमानानि कलहं वर्धयन्ति । क्वचित् अनेकेषु राज्येषु परस्परं शीतयुद्धं प्रचलति । वस्तुतः संसारः अशान्तिसागरस्य कूलमध्यासीनो दृश्यते ।
अर्थ: इस समय प्रायः संसार के सभी देशों में अशान्ति देखे जाते हैं। किसी देश में आन्तरिक अव्यवस्था के कारण अशांति है तो कहीं शत्रु देश द्वारा अशांति फैलाया जा रहा है तो कहीं अनेक देशों में शीतयुद्ध चल रहा है। इस प्रकार सारा संसार ही अशांति के वातावरण में जी रहा है।
अशान्तिश्च मानवताविनाशाय कल्पते । अद्य विश्वविध्वंसकान्यस्त्राणि बहून्याविष्कृतानि सन्ति । तैरेव मानवतानाशस्य भयम् । अशान्तेः कारणं तस्याः निवारणोपायश्च सावधानतया चिन्तनीयौ । कारणे ज्ञाते निवारणस्य उपायोऽपि ज्ञायते इति नीतिः ।
अर्थ: अशांति मानवता के विनाश का कारण है। इस समय विनाशकारी अस्त्रों का निर्माण विशाल पैमाने पर हो रहा है, उससे ही मानवता के विनाश का भय बना हुआ है। अशांति के कारणों के निवारण के उपायों पर ध्यानपूर्वक विचार किया जाना चाहिए।
अशांति के कारण और निवारण
वस्तुतः द्वेषः असहिष्णुता च अशान्तेः कारणद्वयम् । एको देशः अपरस्य उत्कर्षं दृष्ट्वा द्वेष्टि, तस्य देशस्य उत्कर्षनाशाय निरन्तरं प्रयतते । द्वेषः एवं असहिष्णुतां जनयति । इमौ दोषौ परस्परं वैरमुत्पादयतः । स्वार्थश्च वैरं प्रवर्धयति ।
अर्थ: वास्तव में, ईर्ष्या एवं असहनशीलता अशान्ति के मुख्य दो कारण है। एक देश दूसरे देश की उन्नति अथवा विकास देखकर जलभुन जाते हैं, और उस देश को हानि पहुँचाने का प्रयास करने लगते हैं। द्वेष ही असहनशीलता पैदा करता है। स्वार्थ दुश्मनी बढ़ाती है।
स्वार्थप्रेरितो जनः अहंभावेन परस्य धर्मं जाति सम्पत्तिं क्षेत्रं भाषां वा न सहते । आत्मन एव सर्वमुत्कृष्टमिति मन्यते। राजनीतिज्ञाश्च अत्र विशेषेण प्रेरकाः ।
अर्थ: स्वार्थ से अंधा व्यक्ति अहंकारवश दुसरों के धार्मिक, सामाजिक और भाषाई एकता सहन नहीं कर पातें। वे निजी विकास को ही उत्तम मानते हैं। इस निकृष्ट विचार के मुख्य प्रेरक राजनेता हैं।
सामान्यः जनः न तथा विश्वसन्नपि बलेन प्रेरितो जायते । स्वार्थोपदेशः बलपूर्वकं निवारणीयः। परोपकारं प्रति यदि प्रवृत्तिः उत्पाद्यते तदा सर्वे स्वार्थं त्यजेयुः। अत्र महापुरुषाः विद्वांसः चिन्तकाश्च न विरलाः सन्ति ।
अर्थ: सामान्य लोग ही नहीं, विशिष्ट जन भी बलपूर्वक प्रेरित किए जाते हैं। इसलिए स्वार्थी भावना को बलपूर्वक दूर करना चाहिए। यदि परोपकार के प्रति रूचि जग जाती है तब स्वतः सारे स्वार्थ मिट जाते हैं।
समाधान के प्रयास और शिक्षा
तेषां कर्तव्यमिदं यत् जने-जने, समाजे-समाजे, राज्ये-राज्ये च परमार्थ वृत्तिं जनयेयुः । शुष्कः उपदेशश्च न पर्याप्तः, प्रत्युत तस्य कार्यान्वयनञ्च जीवनेऽनिवार्यम् । उक्तञ्च – ज्ञानं भारः क्रियां विना।
अर्थ: उनका कर्तव्य है कि वे हर व्यक्ति, हर समाज तथा हर देश में परोपकार की भावना का प्रचार करें। थोथा उपदेश काफी नहीं है, बल्कि वैसा आचरण भी अपनाना जरूरी है। क्योंकि कहा गया है कि-
देशानां मध्ये च विवादान् शमयितुमेव संयुक्तराष्ट्रसंघप्रभृतयः संस्थाः सन्ति । ताश्च काले-काले आशङ्कितमपि विश्वयुद्धं निवारयन्ति ।
अर्थ: दो देशों के आपसी विवाद को खत्म करने के लिए संयुक्त राष्ट संघ आदि संस्थाएँ हैं। यहीं समय-समय पर संभावित विश्व युद्ध को दूर करती है।
बुद्ध के विचार और भारतीय नीति
भगवान बुद्धः पुराकाले एव वैरेण वैरस्य शमनम् असम्भवं प्रोक्तवान् । अवैरेण करुणया मैत्रीभावेन च वैरस्य शान्तिः भवतीति सर्वे मन्यन्ते ।।
अर्थ: प्राचीन काल में भगवान बुद्ध ने कहा था, दुश्मनी से दुश्मनी को खत्म करना संभव नहीं है। मित्रता एवं दया से शत्रुता भाव को शांत करना संभव है। ऐसा सबका मानना है।
भारतीयाः नीतिकाराः सत्यमेव उद्घोषयन्ति – अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् । उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
अर्थ: भारतीय नीतिज्ञों ने सच ही कहा है:
परपीडनम् आत्मनाशाय जायते, परोपकारश्च शान्तिकारणं भवति । अद्यापि परस्य देशस्य संकटकाले अन्ये देशाः सहायताराशि सामग्री च प्रेषयन्ति इति विश्वशान्तेः सूर्योदयो दृश्यते ।
अर्थ: दूसरों के कष्ट पहुँचाने से अपना ही नुकसान होता है और दूसरों के सहयोग से शांति मिलती है। आज भी किसी दूसरे देश के संकट में शहायता राशि भेजी जाती है। इससे विश्व शांति की आशा प्रकट होती है।
Chapter-13 (विश्वशांतिः) – Subjective Question Answer in Hindi
प्रश्न 1. विश्व में अशान्ति के क्या कारण हैं ? अथवा, अशांति के मूल कारण क्या है ? अथवा, विश्व में शांति कैसे स्थापित हो सकती है ?
- वास्तव में अशांति के मूल कारण द्वेष (ईर्ष्या) और असहिष्णुता हैं।
- एक-दूसरे देश की उन्नति देख कर जलने से असहिष्णुता उत्पन्न होती है।
- स्वार्थ की भावना से अशांति और भी बढ़ती है।
- इस अशांति को वैर से नहीं रोका जा सकता है। वैर (शत्रुता) को केवल करुणा और मित्रता से ही नष्ट कर संसार में शांति स्थापित की जा सकती है।
प्रश्न 2. ‘विश्वशान्ति’ पाठ का मुख्य उद्देश्य क्या है ? अथवा, ‘विश्वशान्ति’ पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है ?
- द्वेष, असहिष्णुता, अविश्वास, असंतोष, और स्वार्थ आदि अनेक अवगुणों के कारण संसार में अशांति है।
- यह पाठ शिक्षा देता है कि शांति भारतीय दर्शन का मूल तत्व है।
- इसका उद्देश्य दया, परोपकार, मित्रता भाव से विश्व में शांति स्थापित करना है।
प्रश्न 3. विश्वशांति पाठ के आधार पर उदार हृदय पुरुष का लक्षण बताएँ ।
प्रश्न 4. असहिष्णुता का कारण-निवारण बताएँ ।
- कारण:** असहिष्णुता का मुख्य कारण द्वेष (ईर्ष्या) है। जब एक देश दूसरे देश की उन्नति या प्रगति देखकर जलता है, तो यह असहिष्णुता उत्पन्न होती है।
- निवारण असहिष्णुता को करुणा, मित्रता और आपसी सहयोग की भावना से समाप्त किया जा सकता है।
प्रश्न 5. आज कौन-कौन से आविष्कार विध्वंसक है ?
प्रश्न 6. सभी जनों की देशभक्ति कैसी होनी चाहिए ?
प्रश्न 7. महात्मा बुद्ध के अनुसार वैर की शांति कैसे संभव है ?
प्रश्न 8. वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा क्यों आवश्यक है ?
प्रश्न 9. राष्ट्रसंघ की स्थापना का उद्देश्य स्पष्ट करें।
प्रश्न 10. विश्वशांति का सूर्योदय कब होता है ? अथवा, विश्वशान्ति का सूर्योदय हम कैसे देख सकते हैं ?
प्रश्न 11. हर परिस्थिति में धर्म की ही रक्षा क्यों करनी चाहिए ?
प्रश्न 12. कौन पूरी पृथ्वी को एक परिवार समझते हैं ?
