
gyanmunch.com पर प्रस्तुत Bihar Board Class 10 Sanskrit Chapter 11 व्याघ्रपथिककथा की यह अध्ययन सामग्री छात्रों के लिए बेहद उपयोगी है। यहाँ आप संस्कृत पीयूषम् भाग–2 के इस अध्याय के सभी श्लोकों का संधि-विच्छेद, शब्दार्थ, सरल श्लोकार्थ, तथा Bihar Board Exam में पूछे जाने वाले Objective Questions, Short Answer, और 16 अंक वाले Long Questions का विस्तृत एवं सरल विश्लेषण पढ़ सकते हैं। इस पेज पर उपलब्ध सामग्री विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए तैयार की गई है जो BSEB Class 10 Sanskrit Notes, Sanskrit Chapter 1 Mangalam explanation, और Sanskrit objective questions with answers की खोज कर रहे हैं। gyamunch.com का यह अध्याय छात्रों की परीक्षा तैयारी को मजबूत बनाता है और उन्हें उच्च अंक प्राप्त करने में सहायता प्रदान करता है।
11. व्याघ्रपथिककथा (बाघ और पथिक की कहानी)
पाठ परिचय (हितोपदेश से संकलित)
यह कथा नारायण पंडित रचित प्रसिद्ध नीतिकथाग्रन्थ ‘हितोपदेश‘ के प्रथम भाग ‘मित्रलाभ‘ से संकलित है। इस कथा में लोभाविष्ट व्यक्ति की दुर्दशा का निरूपण है।
उपदेश: अल्प वस्तु के लोभ से आकृष्ट होकर प्राण और सम्मान से वंचित न हों। वंचकों के चक्कर में न पड़े।
अयं पाठः नारायणपण्डितरचितस्य हितोपदेशनामकस्य नीतिकथाग्रन्थस्य मित्रलाभनामकखण्डात् संकलितः।
अर्थ: यह पाठ नारायण पंडित द्वारा रचित हितोपदेश नामक नीतिकथा ग्रन्थ के मित्रलाभ नामक खण्ड से संकलित है।
हितोपदेशे बालकानां मनोरंजनाय नीतिशिक्षणाय च नानाकथाः पशुपक्षिसम्बद्धाः श्राविताः। प्रस्तुत कथायां लोभस्य दुष्परिणामः प्रकटितः।
अर्थ: हितोपदेश में बालकों के मनोरंजन के लिए और नीति-शिक्षा के लिए अनेक कहानियाँ पशु-पक्षी से सम्बन्धित हैं। प्रस्तुत कथा में लोभ के दुष्परिणाम प्रकट किया गया है।
कंगन का प्रस्ताव
कश्चित् वृद्धव्याघ्रः स्नातः कुशहस्तः सरस्तीरे ब्रुते- ‘भो भोः पान्थाः। इदं सुवर्णकंकणं गृह्यताम्।‘
अर्थ: कोई बूढ़ा बाघ स्नान कर कुश हाथ में लेकर तालाब के किनारे बोल रहा था– ‘‘ वो राही, वो राही! यह सोने का कंगन ग्रहण करो।‘‘
पथिक का विचार (आत्म-संदेह)
ततो लोभाकृष्टेन केनचित्पान्थेनालोचितम्- भाग्येनैतत्संभवति। किंत्वस्मिन्नात्मसंदेहे प्रवृŸार्न विधेया। यतः –
अर्थ: इसके बाद लोभ से आकृष्ट होकर किसी राही के द्वारा सोचा गया– भाग्य से ऐसा मिलता है। किन्तु यहाँ आत्म संदेह है। आत्म संदेह की स्थिति में कार्य नहीं करना चाहिए। क्योंकि-
किंतु सर्वत्रार्थार्जने प्रवृतिः संदेह एव। तन्निरूपयामि तावत्।‘ प्रकाशं ब्रुते- ‘कुत्र तव कंकणम् ?‘
अर्थ: लेकिन हर जगह धन प्राप्ति की इच्छा करना अच्छा नहीं होता। इसलिए तब तक विचार लेता हुँ। (बाघ से) सुनकर कहता है- ‘कहाँ है तुम्हारा कंगन?‘
व्याघ्रो हस्तं प्रसार्य दर्शयति।
अर्थ: बाघ हाथ फेलाकर दिखा देता है।
बाघ का उपदेश (राही को फँसाना)
पन्थोऽवदत्- ‘कथं मारात्मके त्वयि विश्वासः ?
अर्थ: पथिक ने पूछा- ‘तुम हिंसक पर कैसे विश्वास किया जाए ?‘
व्याघ्र उवाच- ‘शृणु रे पान्थ ! प्रागेव यौवनदशायामतिदुर्वृत्त आसम्। अनेकगोमानुषाणां वर्धान्मे पुत्रा मृता दाराश्च वंशहीनश्चाहम्।
अर्थ: बाघ ने कहा- ‘हे पथिक सुनो‘ पहले युवास्था में मैं अत्यंत दुराचारी था। अनेक गायों तथा मनुष्यों के मारने से मेरे पुत्र और पत्नि की मृत्यु हो गई और मैं वंशहीन हो गया।
ततः केनचिद्धार्मिकेणाहमादिष्टः – ‘दानधर्मादिकं चरतु भवान्।‘ तदुपदेशादिदानीमहं स्नानशीलो दाता वृद्धो गलितनखदन्तो कथं न विश्वासभूमिः ? मया च धर्मशास्त्राण्यधीतानि। शृणु –
अर्थ: इसके बाद किसी धर्मात्मा ने मुझे उपदेश दिया- ‘‘ आप दान और धर्म आदि करें। उनके उपदेश से मैं इस समय स्नानशील, दानी हुँ तथा बुढ़ा और दंतविहीन हूँ, फिर कैसे विश्वासपात्र नहीं हुँ? मेरे द्वार धर्मशास्त्र भी पढ़ा गया है। सुनो-
तदत्र सरसि स्नात्वा सुवर्णकंकणं गृहाण।
अर्थ: तुम यहाँ तालाब में स्नानकर सोने का कंगन ले लो।
पथिक का अंत और सीख
ततो यावदसौ तद्वचः प्रतीतो लोभात्सरः स्नातुं प्रविशति। तावन्महापंके निमग्नः पलायितुमक्षमः।
अर्थ: उसके बाद उसकी बातों पर विश्वास कर ज्योंही वह लोभ से तालाब में स्नान के लिए प्रविष्ठ हुआ त्योंहि गहरे किचड़ में डुब गया और भागने में असमर्थ हो गया।
पंके पतितं दृष्ट्वा व्याघ्रोऽवदत् – ‘अहह, महापंके पतिताऽसि। अतस्त्वामहमुत्थापयामि।‘ इत्युक्त्वा शनैः शनैरुपगम्य तेन व्याघ्रेण धृतः स पन्थोऽचिन्तयत् –
अर्थ: उसको किचड़ में फंसा देखकर बाघ बोला- अरे रे, तुम गहरे किचड़ में फंस गये हों। इसलिए मैं तुमको निकाल देता हुँ। यह कहकर धीरे-धीरे उसके निकट जाकर उस बाघ ने उस पथिक को पकड़ लिया। उस पथिक ने सोचा-
इति चिन्तयन्नेवासौ व्याघ्रेण व्यापादितः खादितश्च। अत उच्यते –
अर्थ: ऐसा सोचता हुआ पथिक बाघ से पकड़ा गया और खाया गया। इसलिए कहा जाता है-
Chapter-11 (व्याघ्रपथिककथा) – Subjective Question Answer in Hindi
प्रश्न 1. ‘व्याघ्रपथिक कथा’ पाठ में हमें क्या शिक्षा मिलती है ?
प्रश्न 2. ‘व्याघ्रपथिक कथा’ कहाँ से लिया गया है ? इनके लेखक कौन हैं तथा इससे क्या शिक्षा मिलती है ? छः वाक्यों में लिखें ।
- ‘व्याघ्रपथिक कथा’ नारायण पंडित रचित ‘हितोपदेश’ ग्रन्थ से लिया गया है।
- प्रस्तुत कथा में लोभ का दुष्परिणाम प्रकट हुआ है।
- इस कथा में लोभाविष्ट व्यक्ति की दुर्दशा का निरूपण है।
- इसलिए हमें कभी भी अनावश्यक लोभ नहीं करना चाहिए।
- हमें हमेशा अपनी मेहनत से कमाये हुए धन पर विश्वास करना चाहिए।
- अगर हम अनावश्यक लोभ करते हैं तो निश्चित ही किसी न किसी मुसीबत में पड़ सकते हैं।
प्रश्न 3. ‘व्याघ्रपथिक कथा’ के आधार पर बतायें कि दान किसको देना चाहिए ?
प्रश्न 4. सात्विक दान क्या है ? पठित पाठ के आधार पर उत्तर दें ।
प्रश्न 5. “ज्ञानं भारः क्रियां बिना” यह उक्ति व्याघ्रपथिक कथा पर कैसे चरितार्थ होती है ?
- पथिक को शास्त्रों से यह ज्ञान था कि बाघ हिंसक पशु होता है और उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए।
- लेकिन उसने व्यावहारिक ज्ञान का उपयोग नहीं किया और लोभ में आकर बाघ की मीठी बातों पर विश्वास कर लिया।
- व्यावहारिक क्रिया के अभाव में उसका शास्त्रीय ज्ञान व्यर्थ साबित हुआ, और वह मारा गया।
प्रश्न 6. बाघ के द्वारा पकड़ लिए जाने पर पथिक अपने मन में क्या सोचता है ?
प्रश्न 7. धन और दवा किसे देना उचित है ?
प्रश्न 8. अनिष्ठ से इष्ट की प्राप्ति का परिणाम कैसे बुरा होता है ?
प्रश्न 9. सोने के कंगन को देखकर पथिक ने क्या सोचा ?
प्रश्न 10. बाघ ने स्वयं को अहिंसक सिद्ध करने के लिए क्या तर्क दिया ?
- मैं पहले दुर्विचारी था और अनेकों गायों और मनुष्यों को मारा, जिसके पाप से पुत्र और पत्नी मर गए।
- किसी धार्मिक व्यक्ति ने उपदेश दिया कि मैं दान और धर्म करूँ। तब से मैं दान और धर्म कर रहा हूँ।
- मेरे दाँत टूट गये हैं और नख गल गये हैं, इसलिए मैं अब किसी को मार नहीं सकता।
- अंत में उसने पथिक से पूछा कि क्या उसे अब भी विश्वास नहीं होता है।
प्रश्न 11. किसको दान देना चाहिए ?
प्रश्न 12. बूढ़े बाघ ने पथिक को कैसे मारा ?
